बुधवार, 12 अगस्त 2015

बचपन में हम

बचपन में हम बहुत अमीर हुआ करते थे!!
हर बारिश में 2 - 3 जहाज़ हमारे भी चला
करते थे !! 

काग़ज़ के ही क्यों नही पर हवा में हमारे भी
विमान उड़ा करते थे !!
मिट्टी - गारे के ही क्यों ना हो हमारे भी
महल और किले हुआ करते थे !!!

अब कहां रही वो अमीरी,
और कहां रहा वो बचपन.
"हुनर" सड़कों पर तमाशा करता है और 
"किस्मत" महलों में राज करती है!!

"शिकायते तो बहुत है तुझसे ऐ जिन्दगी, 
पर चुप इसलिये हूं कि, जो दिया तूने मुझे ,
वो भी बहुतों को नसीब नहीं होता ।

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